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Surah Yaseen Translation in Hindi

يَسٍ
यासीन।

  1. وَالْقُرْآنِ الْحَكِيمِ
    बुद्धिमान क़ुरआन की शपथ।
  2. إِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ
    निश्चय ही तुम संदेष्टाओं में से हो।
  3. عَلَىٰ صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ
    सीधे मार्ग पर हो।
  4. تَنْزِيلَ الْعَزِيزِ الرَّحِيمِ
    (यह) प्रभुत्वशाली, दयावान (अल्लाह) का अवतरित किया हुआ है।
  5. لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَا أُنْذِرَ آبَاؤُهُمْ فَهُمْ غَافِلُونَ
    ताकि तुम ऐसी कौम को डराओ जिसके बाप-दादा नहीं डराए गए, इसलिए वे बेखबर हैं।
  6. لَقَدْ حَقَّ الْقَوْلُ عَلَىٰ أَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
    निश्चय ही बहुतों पर यह बात (यातना) सत्य हो चुकी है, फिर भी वे ईमान नहीं लाते।
  7. إِنَّا جَعَلْنَا فِي أَعْنَاقِهِمْ أَغْلَالًا فَهِيَ إِلَى الْأَذْقَانِ فَهُمْ مُقْمَحُونَ
    निश्चय ही हमने उनकी गर्दनों में बेड़ियाँ डाल दी हैं, जो ठुड्डियों तक हैं, इसलिए उनके सिर ऊपर को उठे हुए हैं।
  8. وَجَعَلْنَا مِنْ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ سَدًّا وَمِنْ خَلْفِهِمْ सَدًّا فَأَغْشَيْنَاهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
    और हमने उनके आगे एक दीवार बना दी है और पीछे एक दीवार, फिर हमने उन पर पर्दा डाल दिया है, अतः वे देख नहीं सकते।
  9. وَسَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَأَنْذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
    और उनपर एक समान है, चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ, वे ईमान नहीं लाएँगे।
  10. إِنَّمَا تُنْذِرُ مَنِ اتَّبَعَ الذِّكْرَ وَخَشِيَ الرَّحْمَٰنَ بِالْغَيْبِ ۖ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍ وَأَجْرٍ كَرِيمٍ
    तुम तो केवल उसे ही डर सकते हो जो शिक्षा का अनुसरण करे और परोक्ष में ही अत्यंत दयालु से डरे। तो उसे क्षमा और सम्मानजनक प्रतिदान की शुभ सूचना दे दो।
  11. إِنَّا نَحْنُ نُحْيِي الْمَوْتَىٰ وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا وَآثَارَهُمْ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ أَحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ
    निश्चय ही हम ही मृतकों को जीवित करते हैं और जो कर्म उन्होंने आगे भेजे हैं और उनके निशान (पीछे छोड़े गए प्रभाव) लिखते हैं। और हमने हर चीज़ को एक स्पष्ट रजिस्टर (लौह-ए-महफूज़) में गिनकर रखा है।
  12. وَاضْرِبْ لَهُمْ مَثَلًا أَصْحَابَ الْقَرْيَةِ إِذْ جَاءَهَا الْمُرْسَلُونَ
    और उनके लिए नगरवासियों का उदाहरण दो, जब उनके पास संदेष्टा आए।
  13. إِذْ أَرْسَلْنَا إِلَيْهِمُ اثْنَيْنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍ فَقَالُوا إِنَّا إِلَيْكُمْ مُرْسَلُونَ
    जब हमने उनकी ओर दो (संदेष्टा) भेजे, तो उन दोनों को उन्होंने झुठला दिया। फिर हमने एक तीसरे के साथ उनकी सहायता की। उन्होंने कहा, “निश्चय ही हम तुम्हारी ओर भेजे गए हैं।”
  14. قَالُوا مَا أَنْتُمْ إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُنَا وَمَا أَنْزَلَ الرَّحْمَٰنُ مِنْ شَيْءٍ إِنْ أَنْتُمْ إِلَّا تَكْذِبُونَ
    उन्होंने कहा, “तुम हमारे ही समान मानव हो, और अत्यंत दयालु ने कोई चीज़ उतारी ही नहीं है। तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।”
  15. قَالُوا رَبُّنَا يَعْلَمُ إِنَّا إِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُونَ
    उन्होंने कहा, “हमारा पालनहार जानता है कि हम तुम्हारी ओर भेजे गए हैं।”
  16. وَمَا عَلَيْنَا إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
    “और हमपर तो केवल स्पष्ट रूप से पहुँचा देने का ही दायित्व है।”
  17. قَالُوا إِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۖ لَئِنْ لَمْ تَنْتَهُوا لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُمْ مِنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ
    उन्होंने कहा, “हमने तुमसे अशुभ लिया है। यदि तुम नहीं रुके तो हम अवश्य तुम्हें पत्थर मारेंगे और तुम्हें हमारी ओर से दुःखद यातना पहुँचेगी।”
  18. قَالُوا طَائِرُكُمْ مَعَكُمْ ۚ أَئِنْ ذُكِّرْتُمْ ۚ بَلْ أَنْتُمْ قَوْمٌ مُسْرِفُونَ
    उन्होंने कहा, “तुम्हारा अशुभ तुम्हारे साथ ही है। क्या (तुम अशुभ मानते हो) क्योंकि तुम्हें सीख दी गई? बल्कि तुम अति करने वाले लोग हो।”
  19. وَجَاءَ مِنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ رَجُلٌ يَسْعَىٰ قَالَ يَا قَوْمِ اتَّبِعُوا الْمُرْسَلِينَ
    और नगर के सुदूर छोर से एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, “हे मेरी कौम! इन संदेष्टाओं का अनुसरण करो।”
  20. اتَّبِعُوا مَنْ لَا يَسْأَلُكُمْ أَجْرًا وَهُمْ مُهْتَدُونَ
    “उसका अनुसरण करो जो तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता और वे सीधे मार्ग पर हैं।”
  21. وَمَا لِيَ لَا أَعْبُدُ الَّذِي فَطَرَنِي وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
    “और मुझे क्या हो गया है कि मैं उसकी उपासना न करूँ जिसने मुझे उत्पन्न किया है और उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।”
  22. أَأَتَّخِذُ مِنْ دُونِهِ آلِهَةً إِنْ يُرِدْنِ الرَّحْمَٰنُ بِضُرٍّ لَا تُغْنِ عَنِّي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا وَلَا يُنْقِذُونِ
    “क्या मैं उसके सिवा दूसरे पूज्य बना लूँ? यदि अत्यंत दयालु मुझे कोई हानि पहुँचाना चाहे, तो उनकी सिफारिश मेरे लिए कुछ भी लाभदायक न होगी और न ही वे मुझे बचा सकेंगे।”
  23. إِنِّي إِذًا لَفِي ضَلَالٍ مُبِينٍ
    “तो निश्चय ही मैं खुली गुमराही में होऊँगा।”
  24. إِنِّي آمَنْتُ بِرَبِّكُمْ فَاسْمَعُونِ
    “निश्चय ही मैं तुम्हारे पालनहार पर ईमान लाया हूँ, अतः मेरी बात सुनो।”
  25. قِيلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَا لَيْتَ قَوْمِي يَعْلَمُونَ
    उससे कहा गया, “स्वर्ग में प्रवेश कर जा।” उसने कहा, “काश! मेरी कौम जान लेती।”
  26. بِمَا غَفَرَ لِي رَبِّي وَجَعَلَنِي مِنَ الْمُكْرَمِينَ
    “कि मेरे पालनहार ने मुझे क्षमा कर दिया और मुझे सम्मानित लोगों में कर दिया।”
  27. وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِ مِنْ بَعْدِهِ مِنْ جُنْدٍ مِنَ السَّمَاءِ وَمَا كُنَّا مُنْزِلِينَ
    और हमने उसके पश्चात उसकी कौम पर आकाश से कोई सेना नहीं उतारी और न हम उतारने वाले थे।
  28. إِنْ كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً فَإِذَا هُمْ خَامِدُونَ
    वह तो केवल एक भीषण ध्वनि थी, फिर अचानक वे सभी शांत (मृत) पड़े रह गए।
  29. يَا حَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِمْ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
    हाय! दासों पर विपत्ति! उनके पास कोई भी संदेष्टा नहीं आया, परन्तु वे उसका उपहास करते रहे।
  30. أَلَمْ يَرَوْا كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنَ الْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
    क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनसे पहले कितनी पीढ़ियों को नष्ट कर दिया? (और अब) वे उनकी ओर लौटकर नहीं आते।
  31. وَإِنْ كُلٌّ لَمَّا جَمِيعٌ لَدَيْنَا مُحْضَرُونَ
    और निश्चय ही उन सभी को एकत्रित होकर हमारे सामने प्रस्तुत किया जाना है।
  32. وَآيَةٌ لَهُمُ الْأَرْضُ الْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَاهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
    और उनके लिए एक निशानी है मृत धरती। हमने उसे जीवित किया और उसमें से अन्न उपजाया, तो वे उसमें से खाते हैं।
  33. وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّاتٍ مِنْ نَخِيلٍ وَأَعْنَابٍ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ الْعُيُونِ
    और हमने उसमें खजूर और अंगूर के बाग़ बनाए और उसमें स्रोत फूट निकले।
  34. لِيَأْكُلُوا مِنْ ثَمَرِهِ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
    ताकि वे उसके फल खाएँ, हालाँकि यह उनके हाथों का बनाया नहीं है। तो क्या वे कृतज्ञ नहीं होते?
  35. سُبْحَانَ الَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنْبِتُ الْأَرْضُ وَمِنْ أَنْفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
    पवित्र है वह जिसने सभी जोड़े उत्पन्न किए, उनमें से जो धरती उगाती है और उन्हीं में से (मनुष्य) और उन चीज़ों में से जिन्हें वे नहीं जानते।
  36. وَآيَةٌ لَهُمُ اللَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَإِذَا هُمْ مُظْلِمُونَ
    और उनके लिए एक निशानी रात है, हम उसमें से दिन को उतार देते हैं, तो अचानक वे अंधकार में हो जाते हैं।
  37. وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ
    और सूर्य अपने नियत स्थान की ओर चल रहा है। यह प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ की व्यवस्था है।
  38. وَالْقَمَرَ قَدَّرْنَاهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَالْعُرْجُونِ الْقَدِيمِ
    और चंद्रमा के लिए हमने मंज़िलें निर्धारित कर दी हैं, यहाँ तक कि वह पुरानी खजूर की डाली के समान (घटकर) हो जाता है।
  39. لَا الشَّمْسُ يَنْبَغِي لَهَا أَنْ تُدْرِكَ الْقَمَرَ وَلَا اللَّيْلُ سَابِقُ النَّهَارِ ۚ وَكُلٌّ فِي فَلَكٍ يَسْبَحُونَ
    न सूर्य के लिए योग्य है कि चंद्रमा को जा पकड़े और न रात, दिन से आगे निकल सकती है। और प्रत्येक एक कक्षा में तैर रहा है।
  40. وَآيَةٌ لَهُمْ أَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِي الْفُلْكِ الْمَشْحُونِ
    और उनके लिए एक निशानी यह है कि हमने उनकी संतान को भरे हुए जहाज़ में ढोया है।
  41. وَخَلَقْنَا لَهُمْ مِنْ مِثْلِهِ مَا يَرْكَبُونَ
    और हमने उनके लिए उसी के समान और (सवारियाँ) बनाई हैं, जिनपर वे सवार होते हैं।
  42. وَإِنْ نَشَأْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ يُنْقَذُونَ
    और यदि हम चाहें तो उन्हें डुबो दें, तो न कोई उनकी पुकार सुनने वाला हो और न ही उन्हें बचाया जाए।
  43. إِلَّا رَحْمَةً مِنَّا وَمَتَاعًا إِلَىٰ حِينٍ
    परन्तु हमारी दया से और एक नियत समय तक के सुख-भोग के लिए (बचाए रखते हैं)।
  44. وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّقُوا مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
    और जब उनसे कहा जाता है, “उस (अज़ाब) से डरो जो तुम्हारे सामने है और जो तुम्हारे पीछे है, ताकि तुमपर दया की जाए।”
  45. وَمَا تَأْتِيهِمْ مِنْ آيَةٍ مِنْ آيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ
    और उनके पालनहार की कोई भी निशानी उनके पास नहीं आती, परन्तु वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं।
  46. وَإِذَا قِيلَ लَهُمْ أَنْفِقُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ قَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا أَنُطْعِمُ مَنْ لَوْ يَشَاءُ اللَّهُ أَطْعَمَهُ إِنْ أَنْتُمْ إِلَّا فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ
    और जब उनसे कहा जाता है, “अल्लाह ने जो रोज़ी तुम्हें दी है, उसमें से खर्च करो,” तो जिन लोगों ने इनकार किया है, वे ईमान वालों से कहते हैं, “क्या हम उसे खिलाएँ जिसे यदि अल्लाह चाहता तो खिला देता? तुम तो खुली गुमराही में हो।”
  47. وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ
    और वे कहते हैं, “यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?”
  48. مَا يَنْظُرُونَ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً تَأْخُذُهُمْ وَهُمْ يَخِصِّمُونَ
    वे केवल एक भीषण ध्वनि की प्रतीक्षा में हैं, जो उन्हें आ लेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे।
  49. فَلَا يَسْتَطِيعُونَ تَوْصِيَةً وَلَا إِلَىٰ أَهْلِهِمْ يَرْجِعُونَ
    तो वे कोई वसीयत भी न कर सकेंगे और न अपने घर वालों की ओर लौट सकेंगे।
  50. وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَإِذَا هُمْ مِنَ الْأَجْدَاثِ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يَنْسِلُونَ
    और सिंग (इसराफ़ील के फ़रिश्ते के सिंग) में फूँक मारी जाएगी, तो अचानक वे कब्रों से निकलकर अपने पालनहार की ओर दौड़ेंगे।
  51. قَالُوا يَا وَيْلَنَا مَنْ بَعَثَنَا مِنْ مَرْقَدِنَا ۜ ۗ هَٰذَا مَا وَعَدَ الرَّحْمَٰنُ وَصَدَقَ الْمُرْسَلُونَ
    वे कहेंगे, “हाय हमारी दुर्गति! किसने हमें हमारी शय्या से उठा दिया? यह वही है जिसका अत्यंत दयालु ने वादा किया था और संदेष्टाओं ने सच कहा था।”
  52. إِنْ كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً فَإِذَا هُمْ جَمِيعٌ لَدَيْنَا مُحْضَرُونَ
    यह तो केवल एक भीषण ध्वनि ही होगी, तो अचानक वे सबके-सब हमारे सम्मुख प्रस्तुत कर दिए जाएँगे।
  53. فَالْيَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا وَلَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ
    तो आज किसी प्राणी पर ज़रा भी अत्याचार नहीं किया जाएगा और तुम्हें केवल उसी का बदला दिया जाएगा जो कर्म तुम करते थे।
  54. إِنَّ أَصْحَابَ الْجَنَّةِ الْيَوْمَ فِي شُغُلٍ فَاكِهُونَ
    निश्चय ही स्वर्गवासी आज आनंद के कामों में लगे हुए हैं।
  55. هُمْ وَأَزْوَاجُهُمْ فِي ظِلَالٍ عَلَى الْأَرَائِكِ مُتَّكِئُونَ
    वे और उनकी पत्नियाँ छायाओं में सिंहासनों पर टेक लगाए हुए हैं।
  56. لَهُمْ فِيهَا فَاكِهَةٌ وَلَهُمْ مَا يَدَّعُونَ
    उनके लिए वहाँ फल हैं और वे जो माँगेंगे, उनके लिए होगा।
  57. سَلَامٌ قَوْلًا مِنْ رَبٍّ رَحِيمٍ
    “शांति” की बात एक दयावान पालनहार की ओर से (सुनाई देगी)।
  58. وَامْتَازُوا الْيَوْمَ أَيُّهَا الْمُجْرِمُونَ
    और (कहा जाएगा) “हे अपराधियो! आज अलग हो जाओ।”
  59. أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَا بَنِي آدَمَ أَنْ لَا تَعْबُدُوا الشَّيْطَانَ ۖ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُبِينٌ
    “हे आदम की सन्तान! क्या मैंने तुमसे वचन नहीं लिया था कि शैतान की उपासना न करना, निश्चय ही वह तुम्हारा खुला शत्रु है।”
  60. وَأَنِ اعْبُدُونِي ۚ هَٰذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ
    “और यह कि केवल मेरी ही उपासना करो, यही सीधा मार्ग है।”
  61. وَلَقَدْ أَضَلَّ مِنْكُمْ جِبِلًّا كَبِيرًا ۖ أَفَلَمْ تَكُونُوا تَعْقِلُونَ
    “और निश्चय ही उसने तुममें से एक बड़ी संख्या को पथभ्रष्ट कर दिया। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते थे?”
  62. هَٰذِهِ جَهَنَّمُ الَّتِي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ
    “यही नरक है जिसकी तुमसे धमकी दी जाती थी।”
  63. اصْلَوْهَا الْيَوْمَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ
    “तुम आज इसमें प्रवेश करो, उसके कारण जो कुछ तुम इनकार करते थे।”
  64. الْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَىٰ أَفْوَاهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَا أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
    आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देंगे और उनके हाथ हमसे बात करेंगे और उनके पैर गवाही देंगे जो कुछ वे कमाते रहे थे।
  65. وَلَوْ نَشَاءُ لَطَمَسْنَا عَلَىٰ أَعْيُنِهِمْ فَاسْتَبَقُوا الصِّرَاطَ فَأَنَّىٰ يُبْصِرُونَ
    और यदि हम चाहते तो उनकी आँखें मिटा देते, फिर वे मार्ग की ओर दौड़ते, तो वे देख कैसे सकते?
  66. وَلَوْ نَشَاءُ لَمَسَخْنَاهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا اسْتَطَاعُوا مُضِيًّا وَلَا يَرْجِعُونَ
    और यदि हम चाहते तो उन्हें उनके स्थान पर ही रूप बदल देते, तो वे न आगे बढ़ सकते और न पीछे लौट सकते।
  67. وَمَنْ نُعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ
    और जिसे हम दीर्घायु करते हैं, हम उसे सृष्टि में उलटा (बूढ़ा) कर देते हैं। तो क्या वे बुद्धि से काम नहीं लेते?
  68. وَمَا عَلَّمْنَاهُ الشِّعْرَ وَمَا يَنْبَغِي لَهُ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ وَقُرْآنٌ مُبِينٌ
    और हमने उसे (पैग़ंबर को) कविता नहीं सिखाई और न यह उसके लिए उचित है। यह तो केवल एक शिक्षा और स्पष्ट क़ुरआन है।
  69. لِيُنْذِرَ مَنْ كَانَ حَيًّا وَيَحِقَّ الْقَوْلُ عَلَى الْكَافِرِينَ
    ताकि वह जीवित (दिल) वाले को डरा दे और काफ़िरों पर यह बात (यातना) सत्य हो जाए।
  70. أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّا خَلَقْنَا لَهُمْ مِمَّا عَمِلَتْ أَيْدِينَا أَنْعَامًا فَهُمْ لَهَا مَالِكُونَ
    क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके लिए अपने हाथों के बनाए हुए चौपायों की सृष्टि की, तो वे उनके मालिक हैं।
  71. وَذَلَّلْنَاهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوبُهُمْ وَمِنْهَا يَأْكُلُونَ
    और हमने उन्हें उनके वश में कर दिया, तो उनमें से कुछ उनकी सवारी हैं और कुछ उनमें से वे खाते हैं।
  72. وَلَهُمْ فِيهَا مَنَافِعُ وَمَشَارِبُ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
    और उनके लिए उनमें (और) लाभ हैं और पेय हैं। तो क्या वे कृतज्ञ नहीं होते?
  73. وَاتَّخَذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ آلِهَةً لَعَلَّهُمْ يُنْصَرُونَ
    और उन्होंने अल्लाह के सिवा दूसरे पूज्य बना लिए, ताकि वे सहायता पाएँ।
  74. لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَهُمْ وَهُمْ لَهُمْ جُنْدٌ مُحْضَرُونَ
    वे (मूर्तियाँ) उनकी सहायता नहीं कर सकतीं, बल्कि वे (मूर्तिपूजक) उनकी (सहायक) सेना के रूप में प्रस्तुत किए जाएँगे।
  75. فَلَا يَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّا نَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
    अतः (हे पैग़ंबर!) उनकी बातें तुम्हें दुःख न दें। निश्चय ही हम वह जानते हैं जो वे छिपाते हैं और जो प्रकट करते हैं।
  76. أَوَلَمْ يَرَ الْإِنْسَانُ أَنَّا خَلَقْنَاهُ مِنْ نُطْفَةٍ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌ مُبِينٌ
    क्या मनुष्य ने नहीं देखा कि हमने उसे वीर्य की एक बूँद से उत्पन्न किया, फिर वह खुला विवाद करने वाला हो गया?
  77. وَضَرَبَ لَنَا مَثَلًا وَنَسِيَ خَلْقَهُ ۖ قَالَ مَنْ يُحْيِ الْعِظَامَ وَهِيَ رَمِيمٌ
    और उसने हमारे लिए एक उदाहरण दिया और अपनी उत्पत्ति भुला दी। वह कहता है, “कौन इन हड्डियों को जीवित करेगा, जबकि ये सड़-गल चुकी हैं?”
  78. قُلْ يُحْيِيهَا الَّذِي أَنْشَأَهَا أَوَّلَ مَرَّةٍ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيمٌ
    (हे पैग़ंबर!) कह दो, “उसे वही जीवित करेगा जिसने उन्हें पहली बार उत्पन्न किया और वह प्रत्येक सृष्टि को जानने वाला है।”
  79. الَّذِي جَعَلَ لَكُمْ مِنَ الشَّجَرِ الْأَخْضَرِ نَارًا فَإِذَا أَنْتُمْ مِنْهُ تُوقِدُونَ
    “वही है जिसने तुम्हारे लिए हरे वृक्ष से आग पैदा की, फिर तुम उसी से (अपनी) आग जलाते हो।”
  80. أَوَلَيْسَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِقَادِرٍ عَلَىٰ أَنْ يَخْلُقَ مِثْلَهُمْ ۚ بَلَىٰ وَهُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيمُ
    “क्या वह जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया, उनके समान (फिर से) पैदा करने में सक्षम नहीं है? हाँ! और वह बड़ा उत्पादक, सर्वज्ञ है।”
  81. إِنَّمَا أَمْرُهُ إِذَا أَرَادَ شَيْئًا أَنْ يَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ
    निश्चय ही उसका काम, जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो बस इतना ही है कि उससे कह दे, “हो जा,” और वह हो जाती है।
  82. فَسُبْحَانَ الَّذِي بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
    अतः पवित्र है वह जिसके हाथ में हर चीज़ का राज्य है और तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे।

सूरह यासीन को अक्सर “कुरआन का दिल” कहा जाता है। यह हर मुसलमान के जीवन में धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सूरह यासीन का हिंदी अनुवाद पढ़ने से प्रत्येक आयत का अर्थ स्पष्ट होता है और अल्लाह के संदेश को गहराई से समझने में मदद मिलती है।

सूरह यासीन की सामान्य जानकारी

सूरह यासीन कुरआन की 36वीं सूरह है और इसमें कुल 83 आयतें हैं। यह मक्का मक्की सूरह है और निम्नलिखित विषयों पर प्रकाश डालती है:

  • अल्लाह की शक्ति और रहमत
  • इंसान के नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य
  • आख़िरत, क़यामत और हिसाब-किताब
  • पैगम्बरों की कहानियाँ और उनके विरोधी समुदायों की सज़ाएँ
  • ब्रह्मांड में अल्लाह के संकेत

सूरह यासीन का हिंदी अनुवाद प्रत्येक आयत का भावार्थ स्पष्ट करता है और पाठक को आध्यात्मिक एवं नैतिक दृष्टिकोण से मार्गदर्शन प्रदान करता है।


सूरह यासीन को “कुरआन का दिल” क्यों कहा जाता है?

सूरह यासीन को “कुरआन का दिल” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सूरह निम्नलिखित महत्वपूर्ण संदेश देती है:

  1. अल्लाह की शक्ति और रहमत को समझाना
  2. ईमान और इबादत की आवश्यकता बताना
  3. नैतिक सिद्धांत और इंसानी जिम्मेदारियों पर जोर
  4. पैगम्बरों के किस्से और उनके विरोध करने वाले लोगों के अनुभव
  5. ब्रह्मांड और कائنात में अल्लाह के संकेतों को उजागर करना

हिंदी अनुवाद के माध्यम से पाठक इन संदेशों को आसानी से समझ सकते हैं और अपने जीवन में लागू कर सकते हैं।


सूरह यासीन के मुख्य विषय

1. अल्लाह की रहनुमाई और मार्गदर्शन

सूरह यासीन में अल्लाह की रहनुमाई और पैगंबर ﷺ के मार्गदर्शन को बार-बार उल्लेखित किया गया है।
हिंदी अनुवाद पाठक को बताता है कि अल्लाह की राह पर चलने वाला व्यक्ति कभी भटकता नहीं।

2. इंसान के कर्तव्य

यह सूरह इंसान को अल्लाह के संदेश पर विश्वास करने और सही मार्ग पर चलने की शिक्षा देती है।
अनुवाद समझाता है कि जो लोग अल्लाह के संदेश को नकारते हैं, उनके लिए परिणाम गंभीर होते हैं।

3. पहली नस्लों की कहानियाँ

सूरह यासीन में उन पूर्वी समुदायों की कहानियाँ हैं, जिन्होंने पैगंबरों की अवज्ञा की और नष्ट हो गए।
हिंदी अनुवाद से यह सीख मिलती है कि धैर्य, विश्वास और दृढ़ता जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों में से हैं।

4. काइनात में अल्लाह के संकेत

सूरह में पृथ्वी, आकाश, जीव-जंतु और अन्य घटनाओं में अल्लाह के संकेतों का वर्णन है।
हिंदी अनुवाद पाठक को समझाने में मदद करता है कि ब्रह्मांड में हर चीज़ अल्लाह की शक्ति का प्रमाण है।

5. क़यामत और आख़िरत

सूरह यासीन में क़यामत, हिसाब और जन्नत-दोज़ख के बारे में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
अनुवाद से समझ आता है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार प्रतिफल मिलेगा।


सूरह यासीन के आध्यात्मिक लाभ

सूरह यासीन का हिंदी अनुवाद पढ़ने के लाभ:

  • ईमान और आध्यात्मिक दृढ़ता में वृद्धि
  • नैतिक और व्यवहारिक जीवन में मार्गदर्शन
  • अल्लाह की रहमत और शक्ति पर ध्यान केंद्रित करना
  • मानसिक शांति और हृदय की संतुष्टि प्राप्त करना
  • आभार और इबादत की भावना को बढ़ाना

यह सूरह मुसलमानों के लिए आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शन का उत्कृष्ट स्रोत है।


सूरह यासीन के हिंदी अनुवाद – चुनिंदा आयतें

नीचे कुछ महत्वपूर्ण आयतों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है, ताकि पाठक उनके अर्थ को स्पष्ट रूप से समझ सकें:

  1. यासीन – यासीन
  2. वॉलकुरआनुल हकीम – क़ुरआन, जो पूर्ण और बुद्धिमत्ता से भरा है
  3. इनका लिल्ला मिनाल मुरसलीन – निश्चित रूप से आप पैगंबरों में से हैं
  4. अला सिरत मुझ्तकीम – सीधी राह पर हैं
  5. तुंज़िलुल अजीजुर रहिम – यह शक्तिशाली, दयालु द्वारा नाज़िल किया गया

[नोट: पूरी 83 आयतों के हिंदी अनुवाद को इस लेख में शामिल करके इसे पूर्ण संदर्भ लेख बनाया जा सकता है, जिससे यह SEO के लिए और प्रभावी बन जाएगा।]


सूरह यासीन की शिक्षा और व्यावहारिक संदेश

अल्लाह की इबादत

सूरह यासीन बार-बार याद दिलाती है कि केवल अल्लाह की इबादत करनी चाहिए।
हिंदी अनुवाद यह स्पष्ट करता है कि अल्लाह ही सब कुछ जानने वाला और सर्वशक्तिमान है।

धैर्य और दृढ़ता

पूर्व समुदायों की कहानियाँ हमें धैर्य और दृढ़ता का महत्व सिखाती हैं।
जो लोग पैगंबर ﷺ के संदेश पर विश्वास करते हैं, वे सफल होते हैं।

कृतज्ञता और تقدीर

काइनात में हर चीज़ अल्लाह की शक्ति का प्रमाण है।
हिंदी अनुवाद यह समझाता है कि हमें प्रत्येक نعमत पर कृतज्ञ होना चाहिए।

क़यामत की तैयारी

यह सूरह याद दिलाती है कि हमें हमेशा आख़िरत की तैयारी करनी चाहिए।
केवल अपने कर्मों के आधार पर हमें प्रतिफल मिलेगा।


सूरह यासीन पढ़ने की विधि

  • प्रतिदिन कम से कम एक बार सूरह यासीन पढ़ें
  • हर आयत पर ध्यान दें और उसका हिंदी अनुवाद समझें
  • पढ़ाई के दौरान दुआ और ध्यान करें
  • परिवार और बच्चों के साथ पढ़ें
  • क़ुरआन की शिक्षाओं को जीवन में लागू करें

इस विधि से सूरह यासीन की आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्ता बढ़ती है।


सूरह यासीन हिंदी अनुवाद का उद्देश्य

सूरह यासीन का हिंदी अनुवाद केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं है:

  • आयतों का गहन अर्थ समझना
  • आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से विकास
  • जीवन में अल्लाह की हिदायतों को अपनाना
  • ईमान और आस्था को मजबूत करना

यह अनुवाद हर हिंदी भाषी मुसलमान के लिए मार्गदर्शन का उत्कृष्ट स्रोत है।


निष्कर्ष

Surah Yaseen Translation in Hindi हर मुसलमान के लिए आध्यात्मिक, नैतिक और व्यवहारिक जीवन में मार्गदर्शन का स्रोत है।

  • यह सूरह अल्लाह की शक्ति, रहमत और बुद्धिमत्ता को स्पष्ट करती है
  • हिंदी अनुवाद से हर आयत का अर्थ आसानी से समझा जा सकता है
  • जीवन में नैतिक और आध्यात्मिक सुधार लाने का श्रेष्ठ तरीका है

सूरह यासीन का अध्ययन और हिंदी अनुवाद पढ़ना हर मुसलमान के लिए आवश्यक है ताकि वह ईमान, तौक़ा और अल्लाह की رضا प्राप्त कर सके।

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